गुलेल के पास अक्टूबर 2005 में कच्छ शरद उत्सव के पहले संस्करण के दौरान गुजरात के मुख्यमंत्री की लगभग दर्जनभर पर तस्वीरें हैं. उनमें से एक तस्वीर में नरेंद्र मोदी को आईएएस अधिकारी प्रदीप शर्मा और बेंगलुरू की आर्किटेक्ट युवती से बात करते देखा जा सकता है.

खुलासा: गुजरात के ‘साहेब’ का जासूसी कांड

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यह पूरा सर्विलांस ऑपरेशन अगस्त 2009 में बिना किसी वैधानिक अनुमति के मौखिक आदेश पर किया गया. यह सबकुछ तत्कालीन गृह राज्यमंत्री अमित शाह के आदेश पर एक खास व्यक्ति के लिए किया गया, जिसे अमित शाह ने ‘साहेब’ के नाम से संबोधित किया है.


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वेदांताः गोवा में अवैध खनन का पार्टनर

76 लाख टन खनन, 1.5 करोड़ टन निर्यात. आखिर जब सेसा गोवा को 76 लाख टन खनिज निकालने की अनुमति थी, तो उससे दुगनी खनिज उसने निर्यात कैसे कर दिया. क्या सरकार और कस्टम विभाग को इसकी जानकारी नहीं थी?

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‘यूज एंड थ्रो’ की नीति अपनाती है ओड़िशा सरकार: दंडपाणी मोहंती

मुझे यहां कई तरह का खतरा है. मुझे मारने की साजिश भी है. इसके अलावा मुझे जेल की बुनियादी सुविधा भी नहीं दी जा रही है. मेरे दांतों में दर्द रहता है. तबीयत खराब रहती है. मैंने इसके लिए चिट्ठी भी लिखी की इलाज के लिए मुझे कहीं और भेजा जाए.

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    उत्तराखंड सरकार की ओनिडा को बचाने की साजिश

    सरकारी अभिलेख बताते हैं कि कंपनी सुरक्षा मानकों की अनदेखी कर केवल उत्पादन बढाने में लगी थी. उसके प्रबंधकों को कभी किसी मानक, नियम, सरकारी विभागों के निर्देशोँ और कानून की कोई परवाह नहीं थी. शिफ्ट समाप्त होने के बाद लगी इस आग में 12 लोग जल कर मर गऐ थे. न्याय मिल सकता था लेकिन पैसे और पहुँच के आगे एक बार फिर सच और न्याय हार की कगार पर है..

  • naveen_patnaik_hindi12

    सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, वकील, छात्र एवं आदिवासियों को एक-दो नहीं, बल्कि दर्जनों फर्जी मामलों में झूठे सबूत के आधार पर जेल में रखा जा रहा है और यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. उधर फर्जी एनकाउंटर का सिलसिला थमता नजर नहीं आता है. दिसंबर 2010 से जनवरी 2011 के दौरान ही माओवादियों के साथ मुठभेड़ के नाम पर फर्जी एनकाउंटर में 20 लोग मारे गए.

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    झारखंड: विस्थापन के डर के साए में जीते खूंटी के ग्रामीण

    डैम बनाने जैसी योजनाओं के लिए बड़ी -बड़ी कंपनियों को टेंडर देने की सरकारी स्तर पर कवायद चल रही है.

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बाजार के आगे दबती सामाजिक न्याय की खबरें

इसमें दो राय नहीं कि भारतीय मीडिया का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है. लोकतंत्र पर नजर रखने वाले मीडिया की धार में भोथरापन आ चुका है और जो तेजी दिखती है, उसमें बाजारवाद है.

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